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निष्काम सेवा की सुगंध, समर्पण की आभा – 79वां वार्षिक संत समागम

जहाँ हर कदम सेवा और हर भाव समर्पण का है 

दिल्ली – संत निरंकारी मिशन का 79वां वार्षिक संत समागम 23 से 26 अक्टूबर, 2026 तक समालखा स्थित संत निरंकारी आध्यात्मिक स्थल पर भव्यतापूर्वक आयोजित किया जायेगा, जहाँ हर कदम मानव कल्याण की राह पर बढ़ेगा, हर भाव समर्पण में ढलेगा और हर हृदय प्रेम की उस दिव्य ज्योति से आलोकित होगा, जो मानवता को एकत्व, सद्भाव और प्रभु-भक्ति के सूत्र में पिरोने का संदेश देती है।

सतगुरु माता सुदीक्षा जी महाराज एवं निरंकारी राजपिता रमित जी के पावन सान्निध्य में यह समागम प्रेम, सेवा, सद्भाव और मानव एकता की दिव्य भावना का संदेश देगा। इस पावन समागम की शुभ सूचना से श्रद्धालुओं के हृदय आनंद, उमंग और प्रभु-प्रेम की अनुपम अनुभूति से प्रफुल्लित हैं।

अंतर्मन में जब प्रभु का प्रकाश जागता है, तब जीवन की दिशा बदल जाती है। सेवा में समर्पण, सुमिरन में शांति और सत्संग में सत्य की अनुभूति होने लगती है। यही आत्मिक चेतना और ब्रह्मज्ञान मनुष्य को प्रेम और प्रभु-भक्ति के मार्ग पर अग्रसर करते हैं। इसी भीतर के प्रकाश और चेतना के नवजागरण की दिव्य अनुभूति से परिपूर्ण इस वर्ष का वार्षिक निरंकारी संत समागम श्रद्धालुओं के लिए एक अनुपम आध्यात्मिक यात्रा बनेगा, जिसका प्रेरणादायी विषय है – ‘जागृति’।

इस दिव्य उत्सव की तैयारियाँ श्रद्धा, समर्पण, लगन और निःस्वार्थ सेवा-भाव के साथ पूरे उत्साह से चल रही हैं। हर आयु, वर्ग और पृष्ठभूमि की सीमाओं से परे, श्रद्धालु भक्त तन-मन से सेवा में तल्लीन हैं। प्रातः की पहली किरण से लेकर संध्या के ढलते प्रकाश तक, समागम स्थल का प्रत्येक कोना सेवा, भक्ति और समर्पण की जीवंत छवि प्रस्तुत कर रहा है।

कोई निर्माण कार्य में सहयोग दे रहा है, कोई शामियाने सजा रहा है, तो कोई स्वच्छता, जल व्यवस्था और भोजन सेवा को सुव्यवस्थित करने में लगा है। वहीं वार्षिक निरंकारी संत समागम की भव्यता को दर्शाता मुख्य प्रवेश-द्वार भी आकार ले रहा है, जो प्रेम, समरसता और आत्मिक एकत्व की ओर बढ़ते कदमों का प्रतीक बनकर श्रद्धालुओं का स्वागत करेगा। सेवा का यह अद्भुत दृश्य उस समर्पण की साक्षात अभिव्यक्ति है, जो सतगुरु के ज्ञान से हृदय में जागृत होता है। वास्तव में, जब सेवा में निःस्वार्थ भाव और समर्पण जुड़ जाता है, तो साधारण से साधारण क्षण भी आनंद और उत्सव की अनुभूति से भर जाता है।

सेवा-भाव की इस अनुपम छटा को देखकर सहज ही अनुभव होता है कि सेवकों के चेहरे पर परिश्रम की थकान नहीं, बल्कि संतोष और समर्पण की दिव्य आभा झलक रही है। उनके लिए सेवा केवल एक दायित्व नहीं, बल्कि सतगुरु के प्रति प्रेम और कृतज्ञता को अभिव्यक्त करने का माध्यम है। यही वह आत्मिक आनंद है, जो निःस्वार्थ सेवा, भक्ति और सतगुरु की छत्रछाया में जीवन को भीतर से प्रकाशित करता है। सतगुरु माता जी भी अपने प्रवचनों में निरंतर सेवा, सत्संग और प्रभु-स्मरण के महत्व की प्रेरणा देते हुए कहती हैं कि –

‘तन पवित्र सेवा किये, धन पवित्र दिये दान,

मन पवित्र हरि भजन सों, त्रिबिध होई कल्याण।’

अर्थात् जब तन सेवा में, धन परोपकार में और मन प्रभु-भक्ति में समर्पित हो जाता है, तभी जीवन में सच्चे कल्याण और आत्मिक शांति का मार्ग प्रशस्त होता है।

समागम में सम्मिलित होने वाले श्रद्धालुओं की सुविधा हेतु सभी आवश्यक व्यवस्थाएँ सुचारू रूप से की जा रही हैं। सेवा, सत्कार और अपनत्व की यही भावना प्रत्येक श्रद्धालु को सम्मान एवं सौहार्द से परिपूर्ण वातावरण का अनुभव कराएगी।

निःसंदेह, यह संत समागम मात्र एक आयोजन नहीं, बल्कि मानवता, समरसता और एकत्व का अनुपम पर्व है। विभिन्न संस्कृतियों और परिवेशों से आए श्रद्धालु यहाँ ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ की भावना को साकार करते हुए सतगुरु की अमृतवाणी से अपने अंतर्मन को आलोकित करते हैं। प्रेम, शांति और मानव एकता के इस दिव्य महापर्व में प्रत्येक भाई-बहन एवं सज्जन भक्त का हार्दिक स्वागत है।

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