उत्तराखंड

जंगल में आग, बस्ती में बाघ कहावत हो रही है चरितार्थ – सविता नौटियाल वरिष्ठ पत्रकार

चिन्यालीसौड़ –  जनपद उत्तरकाशी के अंतर्गत चिन्यालीसौड़ बादसि रौंतल में निवासरत वरिष्ठ पत्रकार सविता प्रसाद नौटियाल जो 45 वर्षों से अपनी कलम से पूरे जनपद की समस्याओं से सभी विभागों के अधिकारियों को अवगत कराते रहते हैं उन्होंने कहा कि उनके मित्र ने अपनी कलम से कुछ शब्द लिखे हैं जिसे वे साझा कर रहे हैं  उन्होंने गांव में जंगली जानवरों के आने के मुख्य कारण बताये पहाड़ी क्षेत्रों में खेतों की फसलों को नष्ट करने के लिए बंदरों और शूवरों के झुंड तो आम लोगों को परेशान कर ही रहे थे कि अब बाघ का डर भी सताने लगा है और यह तथ्य भी सही है कि नरभक्षी बाघ कई इंसानों की जान ले चुका है घर के अंदर घुसकर कई मासूमों को उठाकर अपना निवाला बना चुका है और वन विभाग द्वारा कुछ बाघों को नरभक्षी घोषित करने के बाद शिकारी द्वारा मरवाया भी जा चुका है पहले बस्तियों में बाघ अधिकांश बकरी या कुत्तों के शिकार करने के लिए जाना जाता था लेकिन अब जानवरों पर बाघ द्वारा उतने हमले नहीं सामने आ रहे हैं जितने आदमियों पर किए गए हैं इसका तात्पर्य यह है कि बाघ शिकार के लिए मनुष्यों की ओर आकर्षित हो रहा है
पहले दलील यह दी जाती थी कि अधिकांश जंगल कट गए हैं जंगलों का सफाया हो गया है और जंगलों में वन्य जीव बहुत कम हो गए हैं इसलिए जंगलों में बाघ को शिकार नहीं मिल पा रहे हैं और इस कारण वह बस्तियों का रुख कर रहे हैं तत् समय इस दलील में पूरी सत्यता भी थी और उसका कारण यह था कि गांव के लोग अत्यधिक संख्या में पशुपालन करते थे लगभग सभी परिवारों के पास गाय, बैल, भैंसें , भेड़ बकरियां होती थी गाय बैलों के झुंड जंगलों में घास चरने के लिए जाते थे गाय बैल ही नहीं जंगलों में पालतू पशुओं के झुंड भी रहते थे और भारी मात्रा में ग्रामीण पालतू जानवरों के लिए घास भी काटकर जंगल से लाते थे जिस कारण पेड़ , पौधे और झाड़ियां नष्ट हो जाया करती थी। ईंधन की लड़कियों का दोहन भी भारी मात्रा में जंगलों से किया जाता था इसलिए भी जंगल कटते दिखते थे और तब यही आरोप लगता था कि जंगल साफ हो चुके हैं इसलिए बाघ बस्तियों का रुख कर रहे हैं जबकि आजकल यदि ग्राउंड जीरो पर जाकर देखा जाए तो अब स्थिति एकदम भिन्न है बल्कि उलट हो गई है जब से लोगों ने गांव में पशुपालन कम कर दिया है और पहाड़ों के अधिकांश गांव के पलायन अपने चरम पर है तब से जंगल एक प्रकार से संरक्षित हो चुके हैं और जिन जंगलों में पहले कुछ वर्षों में झाड़ियां नजर तक नहीं आती थी अब वह जंगल अत्यधिक घने और झाड़ियां से भर गए हैं जिन चरागाहों में पहले गाय बैल भैंस चारा चुगती थी उनमें आज घने जंगल बन चुके हैं और यही कारण है कि गांव के समीप घनी झाड़ियां में ही बाघों के बसेरे बन चुके हैं और बाघ आदमियों से बिल्कुल नहीं डर रहे हैं बल्कि जंगली जानवरों को मारने का जोखिम न उठाकर सरल शिकार की ओर आकर्षित हो रहे हैं
यह तथ्य आज सही नहीं है कि जंगलों में शिकार कम हो गया है बल्कि आजकल तो कहीं पर भी सड़क के किनारे अगर ध्यान से देखें तो जंगलों में मृग , घोरल , कांकड़ खूब दिखाई देते हैं खास करके जंगली सुवरों के झुंड भी नजर आ जाते हैं साथ ही सड़कों पर आवारा पशुओं , कुत्तो के झुंड भी दिखाई देते हैं इसलिए यह कहना सही नहीं है कि जंगलों में शिकार कम हो गये है
समस्या बहुत गंभीर है इसे हल्के में नहीं लेना चाहिए लोगों की जान बचाने के लिए वन्य जीव विशेषज्ञों को इस पर चिंतन करना पड़ेगा और बाघ सरल शिकार की ओर क्यों आकर्षित हो रहा है इस समस्या का समाधान ढूंढना पड़ेगा

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