राष्ट्रीय

मन के बंधनों से आजादी ही वास्तविक मुक्ति -निरंकारी सतगुरु माता सुदीक्षा जी महाराज

आंतरिक स्वतंत्रता और ब्रह्मज्ञान के संदेश संग मुक्ति पर्व का भव्य आयोजन

दिल्ली – संपूर्ण भारतवर्ष जहाँ स्वतंत्रता दिवस को राष्ट्रभक्ति, गौरव और उल्लास के साथ मना रहा था, वहीं संत निरंकारी मिशन ने इस ऐतिहासिक अवसर पर ब्रह्मज्ञान द्वारा प्रदत्त आंतरिक स्वतंत्रता के दिव्य संदेश को भी जन-जन तक पहुँचाया। यह पर्व इस सत्य को साकार करता है कि वास्तविक मुक्ति बाहरी बंधनों से नहीं, बल्कि अज्ञान, अहंकार और भेदभाव से मुक्त होकर आत्मबोध एवं परमात्मबोध की अनुभूति में निहित है।

मक्ति पर्व का यह पावन अवसर परम श्रद्धेय सतगुरु माता सुदीक्षा जी महाराज एवं निरंकारी राजपिता रमित जी के पावन सान्निध्य में दिल्ली स्थित निरंकारी सरोवर के समक्ष, ग्राउंड नं. 2, निरंकारी चौक, बुराड़ी रोड पर श्रद्धा, भक्ति एवं उल्लासपूर्ण वातावरण में आयोजित हुआ। विदेशों की विस्तृत कल्याणकारी प्रचार यात्रा के सफल समापन के लम्बे अंतराल के उपरांत सतगुरु के पावन दर्शन प्राप्त कर दिल्ली-एनसीआर सहित विभिन्न क्षेत्रों से आए हजारों श्रद्धालु भक्त भाव-विभोर हो उठे।

इस आयोजन में श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए सतगुरु माता सुदीक्षा जी महाराज ने फरमाया कि सच्ची मुक्ति बाहरी बंधनों से नहीं, बल्कि नफरत, अहंकार, छोटी सोच और पूर्वाग्रहों से मुक्त होने में है। हर सांस में निराकार का एहसास रखते हुए प्रेम, भक्ति और स्वीकार्यता से जीना ही जीते-जी मुक्ति है।

सतगुरु माता जी ने माता सविंदर जी के जीवन से प्रेरणा देते हुए लाइट हाउस का उदाहरण दिया कि परिस्थितियां कैसी भी हों, भीतर की शांति, प्रेम और सकारात्मकता की रोशनी सदैव कायम रखें। संतों की शिक्षाओं को केवल सुनना नहीं, बल्कि विचार, कर्म और जीवन में उतारना ही वास्तविक साधना और मुक्ति का मार्ग है।

इस पावन अवसर पर श्रद्धालु भक्तों ने उन महान संत विभूतियों को श्रद्धापूर्वक नमन करते हुए श्रद्धा-सुमन अर्पित किए, जिनके त्याग एवं समर्पण ने मानवता को मुक्तिमार्ग की ओर अग्रसर किया। साथ ही विश्वभर में मिशन की विभिन्न शाखाओं में भी ‘मुक्ति पर्व’ के अवसर पर विशेष सत्संग का आयोजन कर इन महान संत विभूतियों को श्रद्धापूर्वक स्मरण किया गया।

उल्लेखनीय है कि ‘मुक्ति पर्व’ का आरम्भ वर्ष 1964 में जगत माता बुद्धवंती जी की पावन स्मृति में हुआ। वर्ष 1969 में शहनशाह बाबा अवतार सिंह जी के ब्रह्मलीन होने के उपरांत यह दिवस ‘शहनशाह-जगतमाता दिवस’ के रूप में श्रद्धापूर्वक आयोजित किया जाने लगा। वर्ष 1979 में संत निरंकारी मंडल के प्रथम प्रधान संत लाभ सिंह जी की स्मृति को भी इस दिवस से जोड़ते हुए बाबा गुरबचन सिंह जी ने इसे ‘मुक्ति पर्व’ के रूप में स्थापित किया। इस अवसर पर निरंकारी राजमाता जी के भक्तिमय जीवन तथा उनके द्वारा दी गई अनमोल सिखलाईयों का भी जिक्र किया।

वर्ष 2018 से युगनिर्माता माता सविंदर जी को भी इस पावन अवसर पर श्रद्धापूर्वक नमन किया जाता है, जिनका वात्सल्य, विनम्रता, त्याग और निष्काम सेवा से परिपूर्ण जीवन सदैव श्रद्धालु भक्तों के लिए प्रेरणा, मार्गदर्शन और आध्यात्मिक ऊर्जा का स्रोत बना रहेगा। साथ ही, सतगुरु माता जी ने इस पावन दिवस को उन सभी अनन्य भक्तों एवं समर्पित सेवादारों के प्रति कृतज्ञता और श्रद्धा अर्पित करने का अवसर बनाया, जिन्होंने अपने तन, मन और जीवन को निःस्वार्थ भाव से मिशन एवं मानवता की सेवा में समर्पित किया।

निसंदेह मुक्ति पर्व का मूल भाव यही है कि जैसे भौतिक स्वतंत्रता राष्ट्र की प्रगति और उन्नति का मार्ग प्रशस्त करती है, वैसे ही ब्रह्मज्ञान की दिव्य ज्योति मानव को अपनी वास्तविक पहचान का बोध कराते हुए प्रेम एवं सद्भाव के पावन मार्ग पर अग्रसर होने की प्रेरणा प्रदान करती है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

error: Content is protected !!