बद्रीनाथ नाथ में डीजे विवाद के बाद अब शंख पर संग्राम, सतपाल महाराज के बयान से गरमाई सियासत
चारधाम महापंचायत ने पूछा—यह कौन सा दिव्य ज्ञान? शास्त्र-पुराण पढ़ने की दी सलाह
देहरादून – बद्रीनाथ धाम में आयोजित सांस्कृतिक कार्यक्रम में डीजे, तेज संगीत और नृत्य को लेकर शुरू हुआ विवाद अब शंख तक पहुंच गया है। पर्यटन एवं धर्मस्व मंत्री सतपाल महाराज की शंख को लेकर की गई टिप्पणी के बाद चारधाम से जुड़े तीर्थ पुरोहितों ने सवाल उठाए हैं। धार्मिक परंपराओं को लेकर दिए गए इस बयान ने देवभूमि में नई बहस को जन्म दे दिया है।
विवाद के बीच सतपाल महाराज ने बद्रीनाथ धाम की पूजा परंपरा का उल्लेख करते हुए कहा कि मंदिर में पूजा के दौरान शंख का प्रयोग नहीं किया जाता। इसके पीछे उन्होंने ऐसी मान्यता का हवाला दिया कि शंख जानवर की हड्डी से बना होता है। मंत्री के इस कथन के सामने आने के बाद धार्मिक जगत में इसे लेकर सवाल उठने लगे हैं।
चारधाम तीर्थ पुरोहित महापंचायत के महासचिव बृजेश सती ने मंत्री के बयान पर सवाल खड़े करते हुए कहा कि सनातन धार्मिक परंपरा में शंख का विशेष महत्व है। धार्मिक अनुष्ठानों, पूजा-पाठ और मंगल अवसरों पर शंखनाद की परंपरा सदियों से चली आ रही है। उन्होंने मंत्री को शास्त्र और पुराणों का अध्ययन करने की सलाह देते हुए पूछा कि आखिर ऐसा कौन सा धार्मिक ज्ञान है, जिसके आधार पर शंख को इस तरह बताया जा रहा है।
इस विवाद ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि देश-दुनिया के करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था के केंद्र बद्रीनाथ धाम में धार्मिक मर्यादाओं और आधुनिक सांस्कृतिक आयोजनों के बीच सीमा रेखा क्या होनी चाहिए। खासकर तब, जब धाम में आयोजित कार्यक्रम को लेकर पहले से ही तीर्थ पुरोहितों और धार्मिक संगठनों की ओर से आपत्तियां सामने आ चुकी हैं।
दरअसल, बद्रीनाथ के टूरिस्ट अराइवल प्लाजा में आयोजित देवभूमि सांस्कृतिक महोत्सव के दौरान डीजे और नृत्य के वीडियो सामने आने के बाद विवाद शुरू हुआ था। आलोचकों ने सवाल उठाया कि बद्रीनाथ जैसे विश्वप्रसिद्ध धार्मिक स्थल के समीप आयोजित कार्यक्रमों में धाम की धार्मिक गरिमा और स्थानीय परंपराओं का कितना ध्यान रखा गया। वहीं आयोजन से जुड़े पक्ष की ओर से इसे उत्तराखंड की संस्कृति, लोक कला और पर्यटन को बढ़ावा देने वाला कार्यक्रम बताया गया।
अब शंख को लेकर सामने आया बयान विवाद को धार्मिक विमर्श के एक और स्तर पर ले गया है। एक ओर सरकार की ओर से सांस्कृतिक आयोजनों और पर्यटन को बढ़ावा देने की बात कही जा रही है, तो दूसरी ओर तीर्थ पुरोहित धार्मिक परंपराओं और मर्यादाओं के पालन पर जोर दे रहे हैं।
बद्रीनाथ केवल एक पर्यटन स्थल नहीं बल्कि सनातन आस्था के प्रमुख धामों में शामिल है। ऐसे में यहां होने वाले आयोजनों को लेकर छोटी-सी टिप्पणी भी बड़ी बहस का रूप ले सकती है। फिलहाल डीजे से शुरू हुआ विवाद शंख तक पहुंच चुका है और सवाल यही है कि बद्रीनाथ की धार्मिक परंपराओं की व्याख्या आखिर किस आधार पर और किसके द्वारा की जानी
चाहिए।

