उत्तराखंड

पिता केवल मेरे जीवन के आधार ही नहीं, बल्कि मेरी सबसे बड़ी प्रेरणा भी हैं – मनोज बिजल्वाण

पुरोला – जनपद उत्तरकाशी के पार गांव में जन्मे मनोज बिजल्वाण हमेशा युवाओं के लिए प्रेणा स्रोत रहे हैं उन्होंने गरीब परिवार में जन्म लिया लेकिन अपनी मेहनत से वे आज  आदर्श शिक्षक की जिम्मेदारी निभा रहे हैं उन्होंने अपने पिता के बारे में लिखा कि –  (मेरे बाबा)

मैं बचपन से ही अपने पिता को “बाबा” कहकर पुकारता आया हूँ। वे केवल पाँचवीं कक्षा तक पढ़े हैं, किन्तु उनके विचार और जीवन-दृष्टि किसी विद्वान से कम नहीं हैं। उन्होंने हमेशा यह सपना देखा कि उनका बेटा पढ़-लिखकर एक बड़ा आदमी बने। इस सपने को साकार करने के लिए उन्होंने मेरी माँ के साथ मिलकर खेती-बाड़ी में दिन-रात हाड़-तोड़ मेहनत की।

आर्थिक तंगी के बावजूद उन्होंने मुझे कभी किसी चीज़ की कमी महसूस नहीं होने दी। उनका सपना ही उनका संबल था, जिसने उन्हें चैन से सोने तक नहीं दिया। मेरी खुशियों के लिए उन्होंने हर संभव प्रयास किया और मुझे कभी रोने नहीं दिया।

स्वभाव से वे थोड़े गुस्सैल हैं, और कभी-कभी किसी से उलझ भी जाते हैं, लेकिन गाँव के लोग उन्हें दिल का बहुत साफ इंसान मानते हैं। वे जो भी कहते हैं, सामने ही स्पष्ट रूप से कहते हैं। गाँव में उनका लंबा कद उन्हें अलग पहचान देता है, इसलिए लोग प्यार से उन्हें “लंबू” भी कहते हैं।

मेरे बाबा केवल एक मेहनती किसान ही नहीं, बल्कि एक समझदार और न्यायप्रिय व्यक्ति भी हैं। उन्होंने अपनी सूझ-बूझ से पंच के रूप में कई परिवारों को टूटने से बचाया और लोगों को अदालतों के चक्कर लगाने से रोका।

बाहरी रूप से वे जितने कठोर दिखते हैं, भीतर से उतने ही कोमल और भावुक हैं—ठीक एक अखरोट की तरह। बचपन में जब मैं बीमार पड़ता था, तो वे मुझे अपनी पीठ पर लादकर डॉक्टर के पास ले जाते थे। मेरे सामने मेरा हौसला बढ़ाते, लेकिन अकेले में आँसू बहाते थे।

वे भगवान शिव के परम भक्त हैं। मेरी लंबी उम्र के लिए वे मंदिर जाकर महामृत्युंजय मंत्र का पाठ करवाते और भोलेनाथ से प्रार्थना करते। एक बार सावन के महीने में जब मेरी तबीयत बहुत बिगड़ गई थी और मेरी जान पर बन आई थी, तब उन्होंने पूरे विश्वास और श्रद्धा के साथ तीन दिनों तक निरंतर जलाभिषेक किया। उनकी आस्था का ही परिणाम था कि डॉक्टरों ने अंततः कहा कि मैं बिना ऑपरेशन के ही ठीक हो सकता हूँ। उस दिन मुझे मानो नया जीवन मिला।

हर वर्ष नव संवत्सर पर वे मेरी जन्मपत्री दिखवाते हैं, वर्षफल बनवाते हैं और ग्रह शांति के लिए तोलदान करवाते हैं। उनके हर प्रयास में मेरे प्रति उनका अथाह प्रेम और समर्पण झलकता है।

मेरे पिता केवल मेरे जीवन के आधार ही नहीं, बल्कि मेरी सबसे बड़ी प्रेरणा भी हैं। उनका संघर्ष, उनका त्याग और उनका प्रेम मेरे जीवन की सबसे बड़ी पूंजी है।

मनोज बिजल्वाण ‘ अनाम ‘

मनोज की इस लेख से सभी युवा पीढ़ियों को सिख की भी जरूरत है कि माँ बाप  ही जीवन की सबसे बड़ी पूंजी व देवी देवता हैं उन्हें हमेशा देवताओं की तरह आदर देते रहें।

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