उत्तराखंड

नागराजा देवता की जतर हवन पूजन के साथ हुई सम्पन्न

पुरोला – जनपद उत्तरकाशी के पुरोला विकास खण्ड के ग्राम पंचायत धिवरा में सेम मुखेम की तर्ज पर मेले का आयोजन हुआ । जिसमें सैकड़ों लोगों ने भाग लिया। नागराजा की डोली 25 नवम्बर को सेम मुखेम पहुँची डोली के साथ सैकड़ों लोग गए।26 नवम्बर को डोली अपने मंदिर में आयी ,कई गांव के लोग देवता के दर्शन के पहुंचे।।

सेम मुखेम नागराजा मंदिर उत्तराखंड के टिहरी गढ़वाल जिले, प्रतापनगर ब्लॉक के मुखेम गांव के पास है।

समुद्रतल से लगभग 7000 फीट ऊँचाई पर स्थित है, और मंदिर परिसर प्राकृतिक जंगलों व घाटियों से घिरा हुआ है।

इस मंदिर को एक “नाग तीर्थ” माना जाता है — यहाँ नाग (सर्प देवता) यानी नागराज की पूजा होती है।

पौराणिक कथा और धार्मिक महत्व में मान्यता है कि इस स्थान पर भगवान श्रीकृष्ण आए थे — और उन्हें इस जगह की हरियाली और पवित्रता इतनी प्रिय लगी कि उन्होंने यहाँ तपस्या की थी।

कथा है कि जब कृष्ण ने यहाँ रहने के लिए राजा गंगू रमोला से ज़मीन माँगी, तब उसे देने से मना कर दिया गया — और उसी जगह आज यह मंदिर बना।

मंदिर के गर्भगृह में एक स्वयं-भूमि नागराज की शिला है, जिसे मान्यता है कि द्वापर युग की है।

ऐसा भी कहा जाता है कि यदि किसी व्यक्ति की कुंडली में “काल सर्प दोष” है, तो यहाँ आकर पूजा-अर्चना करने से उसे मुक्ति मिलती है।

हर तीन साल पर (त्रिवार्षिक) यहाँ सेम नागराजा मेला लगता है — यह मेला श्रद्धालुओं के लिए विशेष होता है, जिसमें पूजा-अर्चना, भजन-कीर्तन, डोली (देव डोली) आदि समागम होते हैं।

2025 में इस मेले को आधिकारिक स्वरूप दे दिया गया है — अर्थात इस बार यह “राजकीय मेला” आयोजित होने जा रहा है।

मेले के दौरान मंदिर समिति व स्थानीय प्रशासन द्वारा व्यवस्थाओं पर विशेष ध्यान दिया जाता है। भक्तों के लिए मार्ग, आवास व सुरक्षा व्यवस्था जैसी सुविधाएँ सुनिश्चित की जाती हैं।

इसके अलावा, 2025 में कार्यक्रमों, सजावट व मंदिर के संवर्द्धन पर काम हुआ है, ताकि तीर्थाटन व भक्त-यात्रा सुगम और व्यवस्थित हो सके।

मंदिर तक पहुँचने के लिए ऋषिकेश से लगभग 126 किलोमीटर का सफर है, जिसे कार या बस द्वारा पूरा किया जा सकता है, उसके बाद मुखेम गांव से लगभग 3 किमी पैदल या सड़क मार्ग से मंदिर पहुँचा जा सकता है।

मंदिर का प्रवेश द्वार 14 फीट चौड़ा और 27 फीट ऊँचा है — यह डिज़ाइन नागराज के फन के साथ बनाया गया है, जिस पर बंसी बजाते हुए कृष्ण विराजमान हैं।

दर्शनों व पूजा-अर्चना के लिए सुबह से मंदिर खुला रहता है।

नागराजा मंदिर व डोली के पुजारी पंडित लोकेंद्र पैन्यूली ने कहा कि सेम मुखेम नागराजा मंदिर न सिर्फ एक धार्मिक तीर्थ है, बल्कि हिमालयी संस्कृति, पौराणिक धर्म और प्राकृतिक सौंदर्य का संगम भी है। इसकी पौराणिक कथाएँ, नाग देवता की पूजा की परंपरा, और त्रिवार्षिक मेला इसे भक्तों व यात्रियों दोनों के लिए आकर्षक बनाते हैं। 2025 में इसे राज्य-स्तरीय मेला घोषित करना इस मंदिर के महत्व व मेल-मिलाप की परंपरा को और मजबूत करता है।

 

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

error: Content is protected !!